शिवपुरी
जब शासन के द्वारा वन भूमि क्षेत्रों में मानते हुए मझेरा खदान को बंद कर दिया गया है बाबजूद इसके इस खदान एरिया में अधिक पत्थर-फर्शी होने के चलते यहां से लगातार अवैध उत्खनन और परिवहन जारी है बस हालात यह हो गए कि जब पूर्व में स्वीकृत खदान थी तो यहां से दिन में ट्रेक्टर-ट्रॅालियों में उत्खनन और परिवहन होता था लेकिन अब जब मझेरा खदान बंद हो चुकी है बाबजूद इसके यहां अधिक पत्थर-फर्शी होने के चलते खनन माफिया इस क्षेत्र को छोडऩा नहीं चाहते यही कारण है कि अब दिन के बजाए रात के अंधेरे में मझेरा खदान से प्रतिदिन सैकड़ों ट्रॉलियों की आवाजाही बनी हुई है जहां ट्रेक्टर ट्रॉली के आगे के दोनों पहिए जो कि पत्थरों से भर होते है वह भी उठाए हुए, अपनी जान हथेली पर रखकर धड़ल्ले से मीलों तक ट्रेक्टर दौड़ाए जा रहे है। ऐसे में इस गोरख धंधें को बढ़ावा देने का कार्य भी पुलिस, वन और खनन माफियाओं के संरक्षण में चल रहा है।

बताना होगा कि जिले की अधिकांश वन भूमि या तो वन विभाग या नेशनल पार्क के तहत अधिकृत होने की वजह से वर्षों पूर्व बंद हो चुकी हैं। प्रकृति के संतुलन हेतु वृक्ष एवं पत्थरों को संरक्षित करने के उद्देश्य राज्य शासन ने इन खदानों की नीलामी बंद कर दी और राज्य शासन को मिलने वाले करो से भी समझौता किया गया जिससे राजकीयकोष घाटे में भी चला गया। बाबजूद इसके मुख्यालय से महज कुछ दूरी पर स्थित मझेरा की खदाने वर्षों पूर्व बंद की जा चुकी हैं किंतु पत्थरों का खनन आज भी जारी है फर्क इतना है कि पहले दिन को कार्य हुआ करता था तो आजकल रात कालीन सेवाएं हो रही है।

रात्रिकालीन सेवा में हो रहा जमकर धन संग्रह
बताया जाता है कि पहले खदान स्वीकृति होने के बाद एरिया अनुसार होने वाली खुदाई और ढुलाई से शासन को धन संग्रह हो जाता था जो धनराशि जनहित कार्यों में उपयोग की जाती थी परंतु आजकल सेवा रात्रिकालीन होने से धन संग्रह निजी वितरको में जा रहा है, जिसे मिल बांट कर ऐसो आराम हेतु एवं निजी सुविधाओं पर खर्च किया जा रहा है। सूत्रों की माने तो एक रात्रि में लगभग 35 ट्राली पत्थरों का खनन प्रतिदिन हो रहा है और 6000 प्रति ट्रॉली के हिसाब से रोज का कलेक्शन एकत्रित किया जा रहा है। ऐसे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि प्रतिदिन कितनी धनराशि का संचय किया जा रहा है।

मैनेज किए जा रहे बिचौलिये
अवैध कारोबार को वैध करने के एवज में मझेरा खदान से भी कई लोगों को बिचौलियों के रूप मे मैनेज किया जा रहा है जहां मिलने वाली राशि का कुछ हिस्स विभागीय एवं अन्य सामंजस्य युक्त लोगों के बीच यथा योग्य वितरण हो रहा है। किसी को लिफाफे में तो किसी को डायरेक्ट थैले में गांधीजी की छाया से मुद्रित नोट पहुंच रहे हैं। खदानें बंद होने के बावजूद रात्रि कालीन खनन बड़े पैमाने पर कहीं इसी वजह तो नहीं हो रहा है और जिम्मेदार मौन तो नहीं। शिवपुरी में आय के स्रोत एवं काम धंधों का प्रमुखता से अभाव पाया जाना भी इस उत्खनन का एक कारण हो सकता है, क्योंकि इनके पास आय के अधिक स्रोतों नहीं है, लेकिन जो लोग इसके संरक्षण में लगे हैं उन्हें तो शासन से प्रतिमाह भरपूर वेतन मिल ही रहा। फिर ऐच्छिक धन संग्रह की कमी हो सकती है और उनकी तृष्णा शायद ही कामप्लीशन
सर्टिफिकेट जारी करे।

जान जोखिम में डालकर हो रहा अवैध परिवहन
शासन एवं प्रशासन को अवैध उत्खनन को वैधता प्रदान कर देनी चाहिए जिससे अधिक लोगों को रोजगार प्राप्त हो सके और उनका शोषण वन विभाग द्वारा नहीं हो। इसके साथ ही साथ रॉयल्टी के तौर पर राज्य शासन को भी आमदनी होगी जिसे विकास कार्यों में खर्च किया जा सकता अन्यथा सख्त रूप से अवैध उत्खनन को बंद करते हुए इस जंगली वसूली पर रोक लगा देना चाहिए, क्योंकि जान को जोखिम में डालकर पत्थरों का खनन रात को किया जा रहा है। मीलों तक ट्रेक्टर आगे के पहिए ऊपर उठाए हुए पत्थरों का परिवहन करते देखे जा रहे हैं । उनके मन में डर और अवैध वसूली भरा रहता है जिससे उनकी जान जोखिम में बनी रहती है। अब देखना यह होगा कि शासन एवं प्रशासन इस पर कब कार्यवाही करते हुए लोगों की जान माल की सुरक्षा एवं प्राकृतिक संरक्षण प्रदान करता है या प्रकृति का और इंसान का दोहन यूं ही जारी रहेगा।

Source : Agency