वट वृक्ष यानी क‍ि अक्षय वट का जिक्र पुराणों में भी म‍िलता है। जैसा कि इसके नाम से ही स्‍पष्‍ट है क‍ि इसका कभी क्षय नहीं होता ठीक इसी प्रकार इसके चमत्‍कारों की भी सीमाएं नहीं हैं। त्रेता हो या द्वापर हर युग इसकी कहानी कहता है। यह इसकी महत्‍ता ही है क‍ि वट साव‍ित्री व्रत में इस वृक्ष की पूजा की जाती है। आइए जानते हैं कहां-कहां है अक्षय वट और क्‍या है इसका महत्‍व?

यह श्रीराम के आशीर्वाद से बना अक्षय वट
प्रयाग के दक्षिणी तट पर झूंसी नामक स्थान है जिसका प्राचीन नाम पुरुरवा था। इसे बाद में उलटा प्रदेश के नाम से भी जाना गया। कथा मिलती है कि इस स्‍थान को श‍िव से ऐसा शाप म‍िला था क‍ि जो भी व्यक्ति इस जंगल में प्रवेश करेगा वह औरत बन जाएगा। पौराणिक कथा के अनुसार जब राम अयोध्या से चले तो उनको इस झूंसी या उलटा प्रदेश से होकर ही गुजरना पड़ता। लेकिन भगवान शिव के शाप के कारण उन्हें स्त्री बनना पड़ता। इसलिए उन्होंने रास्ता ही बदल दिया। पौराणिक कथा के अनुसार भगवान राम रास्‍ता बदलकर श्रृंगवेरपुर पहुंचे। जहां महर्षि भारद्वाज उनकी अगुवानी करने पहुंचे। तब श्रीराम ने उनसे पूछा कि हे महर्षि! मैं रात को कहां विश्राम करूं? महर्षि ने बताया कि एक वटवृक्ष है। हम चल कर उससे पूछते हैं कि वह अपनी छाया में ठहरने की अनुमति देगा या नहीं। क्‍योंकि बाकी सबको तो रानी कैकेयी का भय है क‍ि कहीं आपको स्‍थान देने के चलते उन्‍हें दंड न भुगतना पड़े।

तब श्रीराम ने क‍िया यहां विश्राम
पौराणिक कथा के अनुसार इसके बाद महर्षि भारद्वाज भगवान राम को लेकर उस वटवृक्ष के पास पहुंचे। तब श्रीराम ने उनसे पूछा कि क्या वह अपनी छाया में रात बिताने की अनुमति देगें। इस पर उस वटवृक्ष ने पूछा कि मेरी छाया में दिन-रात पता नहीं कितने लोग आते एवं रात्री विश्राम करते हैं लेकिन कोई भी मुझसे यह अनुमति नहीं मांगता। क्या कारण है कि आप मुझसे अनुमति मांग रहे हैं? महर्षि ने पूरी बात बताई। तब वटवृक्ष ने कहा क‍ि अगर क‍िसी के कष्ट में भाग लेकर उसके दुःख को कम करना अपराध है तो मैं यह पाप और अपराध करने के लिये तैयार हूं। आप निश्चिन्त होकर यहां विश्राम कर सकते हैं और जब तक इच्छा हो रह सकते हैं। इस पर भगवान श्रीराम ने उस वट वृक्ष से कहा क‍ि आज से सभी तुम्‍हें अक्षय वट के नाम से जानेंगे। उन्‍होंने कहा क‍ि तुम्हारी छाया में क्षण मात्र का समय बिताने से अक्षय पुण्य फल म‍िलेगा। कहा जाता है क‍ि तभी से वट वृक्ष को अक्षय वट के नाम से जाना जाने लगा।

इसके नीचे शुकदेवजी ने सुनाई थी श्रीमद्भागवत
मुजफ्फरनगर के मोरना में स्‍थापित अक्षय वट की महत्‍ता का इतिहास ऋष‍ि व्‍यास पुत्र श्री शुकदेव मुनि महाराज से जुड़ा है। कथा मिलती है कि इसी स्‍थान पर और इसी वृक्ष के नीचे श्री शुकदेव जी ने हस्तिनापुर के तत्‍कालीन महाराजा परीक्षित को श्रीमद्भागवत सुनाई थी। यह पाठ परीक्षित को ऋषि के गले में सांप डालने के बाद उनके पुत्र द्वारा मिला था। इसके मुताबिक तक्षक नाग के डसने से महाराजा परीक्ष‍ित की मृत्‍यु होने थी। शुकदेव जी महाराज ने श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण पान कराकर महाराज को शाप से मुक्ति दिलाकर मोक्ष की प्राप्ति कराई थी। जैसा कि इसके नाम से ही स्‍पष्‍ट है अक्षय वट यानी कि इसका कभी क्षय न हो। तो बता दें कि पतझड़ आने पर भी इस वृक्ष के पत्‍ते कभी सूखते नहीं हैं। इसके अलावा इतने विशाल वृक्ष में किसी भी तरह की जटाएं नहीं हैं।

इसके नीचे गूंजती है श्रीकृष्‍ण की मुरली धुन
मथुरा में स्‍थापित बंसीवट की अपनी ही महिमा है। कथा मिलती है कि इसी वृक्ष के नीचे श्रीकृष्ण अपनी गाय चराने के लिए आते थे। इसके अलावा श्री राधारानी का श्रृंगार भी वह इसी वृक्ष के नीचे करते थे। मान्‍यता है कि आज भी इस वृक्ष से यदि कान लगाया जाए तो कन्‍हैया की बांसुरी की धुन सुनाई देती है। लेकिन इसके लिए आपका मन शांत और पूर्ण रूप से श्रीकृष्‍ण को समर्पित होना चाहिए।

यह वट वृक्ष बना महाभारत काल का साक्षी
कुरुक्षेत्र से 8 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है ज्‍योतिसर। इसी स्‍थान पर है अक्षय वट। जिसके नीचे श्रीकृष्‍ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था। मान्‍यता है कि जब अपनों के खिलाफ शस्‍त्र उठाने से अर्जुन ने इंकार कर दिया था तो श्रीकृष्‍ण ने इसी अक्षय वट के नीचे उन्‍हें गीता के 18 अध्‍याय सुनाए थे। यह वृक्ष ही महाभारत के दौरान गीता उपदेश का इकलौता साक्षी है। इसके अलावा यह भी कहा जाता है कि आदि शंकराचार्य भी इसी स्‍थान पर गीता के चिंतन के लिए आए थे।

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