भगवान व‍िष्‍णु के चौथे अवतार नृस‍िंह के बारे में तो सभी जानते हैं क‍ि उन्‍होंने यह अवतार हिरण्‍यकश्‍यपु के संहार और भक्‍त प्रहृलाद की रक्षा के लिए धारण क‍िया था। लेकिन उनके इस अवतार की कथा केवल इतनी नहीं है। उत्‍तराखंड के जोशीमठ में भगवान नृसिंह का एक ऐसा मंदिर है जिसका संबंध सृष्टि के व‍िनाश से माना जाता है। आइए जानते हैं कि क्‍या इस प्रतिमा का इतिहास और सृष्टि के अंत से कैसे है इसका संबंध?

यहां गहरी हैं आध्‍यात्मिकता की जड़ें
जोशीमठ में आध्यात्मिकता की जड़ें गहरी हैं। यहां की आब-ओ-हवा को देखकर यूं लगता है जैसा यहां की संस्कृति भगवान विष्णु के इर्द-गिर्द रची-बसी हो। सामान्‍य द‍िनों में यहां स्‍थाप‍ित प्राचीन नृसिंह मंदिर में लोगों का सालभर आना-जाना लगा ही रहता है। बता दें कि जाड़े के मौसम में भगवान बदरीनाथ इसी मंद‍िर में व‍िराजते हैं। यही उनकी पूजा-अर्चना होती है। मान्‍यता है कि जोशीमठ में नृसिंह भगवान के दर्शन क‍िए बिना बदरीनाथ धाम की यात्रा पूरी नहीं मानी जाती। इसलिए मंदिर को नृसिंह बदरी मंदिर कहा जाता है।

मंदिर स्‍थापना को लेकर मिलते हैं कई मत
राजतरंगिणी के अनुसार 8वीं सदी में कश्मीर के राजा ललितादित्य मुक्तापीड़ द्वारा अपनी दिग्विजय यात्रा के दौरान प्राचीन नृसिंह मंदिर का निर्माण उग्र नृसिंह की पूजा के लिये हुआ जो विष्णु का अवतार है। इसके अलावा एक और मत मिलता है कि स्‍वर्गरोहिणी यात्रा के दौरान पांडवों ने इस मंदिर की नींव रखी थी। एक अन्‍य मत के अनुसार इसकी स्थापना आदि गुरु शंकराचार्य ने की क्योंकि वे नृसिंह भगवान को अपना ईष्ट मानते थे। मंदिर में आदि गुरु शंकराचार्य की गद्दी भी स्थित है।

मंदिर में नृसिंह भगवान की प्रतिमा का रहस्‍य
पौराणिक कथाओं के अनुसार नृसिंह बदरी मंदिर में स्‍थापति भगवान नृसिंह की प्रतिमा की बायीं भुजा का संबंध सृष्टि के अंत से संबंध‍ित है। कथा मिलती है कि प्रतिमा की बायीं भुजा धीरे-धीरे पतली होती जा रही हे। लेकिन जिस द‍िन यह पूरी तरह से गायब हो जाएगी, वह द‍िन सृष्टि के अंत यान‍ि क‍ि व‍िनाश का द‍िन होगा। बता दें क‍ि मंद‍िर में स्‍थापित भगवान की यह स्‍वयंभू प्रतिमा शालिग्राम पत्‍थर से बनी है।

यहां गुफा में स्‍थाप‍ित है भगवान नृसिंह का मंद‍िर
राजस्‍थान में भी भगवान नृसिंह का चर्चित मंदिर स्थित है। यह मंदिर एक गुफा में स्थित है। मान्‍यता है कि संत सूरदासजी ने कठोर तपस्‍या के लिय यह गुफा खोदी थी। लंबे समय तक सूरदासजी ने इस गुफा में तपस्‍या की और फिर उन्‍होंने संत रामदासजी समेत अपने अन्‍य साथियों को यहां पर बुला लिया। संत रामदासजी ने इस गुफा में नृसिंह भगवान की प्रतिमा को स्‍थापित किया। यहां भगवान को राजस्‍थान के परंपरागत व्‍यंजनों के साथ मोहन भोग अर्पित किया जाता है।

छत्‍तीसगढ़ में स्‍थाप‍ित नृसिंह भगवान का अद्भुत मंद‍िर
छत्‍तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के ब्रह्मपुरी क्षेत्र में नृसिंह भगवान का करीब 1148 साल पुराना मंदिर स्थित है। भोसले राजा हरहरवंशी ने इसका निर्माण करवाया था। यहां भगवान नृसिंह की प्रतिमा काले पत्‍थर से बनी है। इसकी खासियत है कि यह प्रत‍िमा गर्मी के मौसम में ठंडी रहती है और ठंड के मौसम में गर्म रहती है। यहां साल में एक बार होने वाले विशाल धार्मिक आयोजन में देश के कोने-कोने से भक्‍तजन आते हैं।

भक्‍त प्रहृलाद ने स्‍थाप‍ित की थी नृसिंह की यह प्रतिमा
आंध्रप्रदेश के विशाखापट्टनम से 16 क‍िलोमीटर की दूरी पर स‍िंहाचल पर्वत पर भगवान नृसिंह का मंद‍िर स्‍थापित है। मान्‍यता है कि इसकी स्‍थापना श्रीहर‍ि के परम भक्‍त प्रहृलाद जी महाराज ने की थी। इस मंद‍िर में भगवान लक्ष्‍मीजी के साथ स्‍थापित हैं। लेकिन प्रतिमा पर पूरे समय चंदन का लेप लगा रहता है। यह केवल अक्षय तृतीया के द‍िन ही हटता है। तभी भक्‍तजन भगवान की प्रतिमा के साक्षात् दर्शन कर पाते हैं। मूर्ति पर चंदन का लेप लगाए जाने के विषय में बताया जाता है कि जब हिरण्‍यकश्‍यपु के मारने के बाद भी नृस‍िंह भगवान का क्रोध शांत नहीं हुआ। तब उन्‍हें ठंडक पहुंचाने के लिए चंदन का लेप लगाया गया था। तब जाकर उनका क्रोध शांत हुआ।

600 बरस पुराना है मध्‍यप्रदेश का यह मंद‍िर
मध्‍यप्रदेश के नरसिंहपुर में भगवान नृसिंह का मंद‍िर है। बताया जाता है क‍ि यह 600 बरस पुराना है। इसकी स्‍थापना को लेकर कथा मिलती है कि जाट राजा नाथन सिंह ने इसका न‍िर्माण कराया। कहा जाता है क‍ि नागपुर के राजा ने प‍िंडारियों के सरदार को पकड़कर उनके हवाले करने के लिए इनाम की घोषणा की। तब वीर योद्धा नाथन सिंह ने प‍िंडारियों के सरदार को बंदी बनाकर राजा के सामने पेश किया। तब राजा ने उन्‍हें 200 घुड़सवार और 80 गांव इनाम में द‍िए। इसके बाद उन्‍होंने अपने इष्‍टदेव नृसिंह भगवान का मंद‍िर बनवाया। इसके बाद उसी स्‍थान पर नरसिंहपुर क्षेत्र बसा।

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